तुम कहाँ तो कहाँ नहीं हो
एक भूखे कि भूख में
एक प्यासे कि प्यास में
जीवन कि आस लिए उन आंखों में
जिनके जीवन कि लो बुझने वाली है
किसी की गर्व भरी अट्टहास में
किसी के दर्द भारी आसुंओ में
रोटी की तलाश में कूड़े बीनते बच्चे में
रोटी की जगह पिज्जा खाने कि जिद करते बच्चे में
दोस्त की दोस्ती में
दुश्मन की दुश्मनी में
तुम कल कल बहती शांत नदी में हो
बाढ़ से तबाही मचाती नदी में हो
प्रकृति के सौंदर्य में तुम
एक असहाय प्रकृति में तुम हो
किसी की महत्वाकांक्षा में तुम
किसी के लिए जीवन हो तुम
सब तुम्हे लिखते हैं
तुम कितना लिख पाती हो सब को
सब तुम्हे कविता कहते हैं
पावन शब्दों और भावों से सजती हो तुम
तुम मुझे में इस तरह समाई हो
फिर भी मैं कहाँ लिख पाती हूँ वो सब
जो तुम मुझसे कहती हो
फिर भी खुश हूँ
तुम मैं अब भी बाकी हूँ *मैं *
Thursday, February 10, 2011
Tuesday, January 18, 2011
खोगल *हाल्डा *
हिमाचल कि वादियों में बसा एक जनजातीय जिला लाहौल एवं स्पित्ति .लाहौल स्पीति को शीत मरूस्थल के नाम से भी जाना जाता है . इस शीत मरूस्थल में आज कल त्योहारों का दौर शुरू हो चुका है . मकर संक्रांति को हमारे यहाँ *उतना * के रूप में मनाया जाता है .इसे नव बर्ष के आगमन का त्यौहार भी कहा जा सकता है . इस त्यौहार के बाद मंदिर के कपाट बंद कर लिए जाते हैं और चेत्र महीने के शुरू होने पर ही खोला जाता है जिसे स्थानीय बोली में *चेत्रोडी* भी कहा जाता है .
*उतना * के बाद के पहले पूर्णिमा को हाल्डा यानी *खोगल * मनाया जाता है .इस त्यौहार के दिन बिषेश्त्या अपने पित्तरों को याद किया जाता है और उन्हें भोग आदि चढाया जाता है .यह त्यौहार दो दिन चलता है . पहले दिन अपने कुलदेवता कि पूजा करने के बाद दिन के समय जुनिपर यानी *सरू* के पेड कि लकड़ी को काट कर इसके छोटे छोटे गट्ठे बनाए जाते हैं जिन्हें *हल्ला * कहा जाता है .देवदार के पेड को हमारे यहाँ सबसे पवित्र माना जाता है .
अगले दिन सुबह तडके घर के पुरुष या महिला सदस्य घर कि छत में अपने पित्तरों को भोग चढाते हैं .फिर अपने कुल देवता कि पूजा के बाद त्यौहार कि शुरुआत होता है . अलग अलग किस्म के पकवान बनाए जाते है जैसे *मन्ना * या *एट* आदि . इस दिन घर कि जो बेटियां दूसरे गाँव या उसी गाँव में व्याही होती है उन्हें भेजने के लिए *मारचु* यानी पूरी भी बनाए जाते हैं .इसे बेटी के घर के पहुंचाने के लिए त्यौहार के अगले दिन घर का कोई सदस्य अपनी बेटी के घर जाता है .आटे के दीये भी बना कर रखे जाते हैं .
इसदिन शाम के समय घर में बने सभी पकवानों को थोडा थोडा करके पित्तरों को चढाने के लिए तैयार रखा जाता है .शाम को घर कि महिला या पुरुष सदस्य *सरू * के तनों के बने गट्ठों यानी *हल्ला * को जलाते हैं और पित्तरों को चढ़ाये जाने वाले भोग को टोकरी में डाल कर शमशान कि तरफ जाते हैं पहला दीया उस जगह जलाया जाता है जहाँ मृत शरीर को नहलाए पानी को फैंका जाता है , गाँव के हर घर से यह भोग जाता है . फिर शमशान से थोड़ी दूरी पर दुसरा दीया जलाया जाता है और यहाँ पर सारे गाँव वाले उन जुनिपर के गट्ठो को एकत्रित कर के जलाते हैं और सभी अपने अपने पित्तरों के लिए लाये भोग को उस आग में चढाते हैं और उसे पित्तरों को अर्पित करते हैं .
रात का समय करीबन १० या ११ बजे घर के पुरुष सदस्य एक बार फिर *हल्ला * यानी उन गट्ठों को जला कर पहले देवताओं को चढाते है . और एक निश्चित स्थान पर ले जा कर उसे वहाँ एकत्रित करके जलाते हैं .. और एक उसके बार बुरी आत्माओं को घर से दूर रखने के लिए जलाया जाता है .
इस तरह से यह त्यौहार खत्म हो जाता है .वैसे तो मैने अपनी तरफ से पूरी कोशिश कि है कि हाल्डा के बारे में कोई भी छूटे ना पर इस त्यौहार को अलग अलग हिस्से में अलग तरीके से मनाया जाता है .अगर लाहौल के किसी बंधू के पास ओर जानकारी हैं इस बारे में तो शेयर कर सकते हैं .
हाल्डा के बाद के पहले अमावस्या को सबसे बड़ा त्यौहार *कुंह * यानि *फागली * मनाया जाता है . उसके बारे में फिर कभी
*उतना * के बाद के पहले पूर्णिमा को हाल्डा यानी *खोगल * मनाया जाता है .इस त्यौहार के दिन बिषेश्त्या अपने पित्तरों को याद किया जाता है और उन्हें भोग आदि चढाया जाता है .यह त्यौहार दो दिन चलता है . पहले दिन अपने कुलदेवता कि पूजा करने के बाद दिन के समय जुनिपर यानी *सरू* के पेड कि लकड़ी को काट कर इसके छोटे छोटे गट्ठे बनाए जाते हैं जिन्हें *हल्ला * कहा जाता है .देवदार के पेड को हमारे यहाँ सबसे पवित्र माना जाता है .
अगले दिन सुबह तडके घर के पुरुष या महिला सदस्य घर कि छत में अपने पित्तरों को भोग चढाते हैं .फिर अपने कुल देवता कि पूजा के बाद त्यौहार कि शुरुआत होता है . अलग अलग किस्म के पकवान बनाए जाते है जैसे *मन्ना * या *एट* आदि . इस दिन घर कि जो बेटियां दूसरे गाँव या उसी गाँव में व्याही होती है उन्हें भेजने के लिए *मारचु* यानी पूरी भी बनाए जाते हैं .इसे बेटी के घर के पहुंचाने के लिए त्यौहार के अगले दिन घर का कोई सदस्य अपनी बेटी के घर जाता है .आटे के दीये भी बना कर रखे जाते हैं .
इसदिन शाम के समय घर में बने सभी पकवानों को थोडा थोडा करके पित्तरों को चढाने के लिए तैयार रखा जाता है .शाम को घर कि महिला या पुरुष सदस्य *सरू * के तनों के बने गट्ठों यानी *हल्ला * को जलाते हैं और पित्तरों को चढ़ाये जाने वाले भोग को टोकरी में डाल कर शमशान कि तरफ जाते हैं पहला दीया उस जगह जलाया जाता है जहाँ मृत शरीर को नहलाए पानी को फैंका जाता है , गाँव के हर घर से यह भोग जाता है . फिर शमशान से थोड़ी दूरी पर दुसरा दीया जलाया जाता है और यहाँ पर सारे गाँव वाले उन जुनिपर के गट्ठो को एकत्रित कर के जलाते हैं और सभी अपने अपने पित्तरों के लिए लाये भोग को उस आग में चढाते हैं और उसे पित्तरों को अर्पित करते हैं .
रात का समय करीबन १० या ११ बजे घर के पुरुष सदस्य एक बार फिर *हल्ला * यानी उन गट्ठों को जला कर पहले देवताओं को चढाते है . और एक निश्चित स्थान पर ले जा कर उसे वहाँ एकत्रित करके जलाते हैं .. और एक उसके बार बुरी आत्माओं को घर से दूर रखने के लिए जलाया जाता है .
इस तरह से यह त्यौहार खत्म हो जाता है .वैसे तो मैने अपनी तरफ से पूरी कोशिश कि है कि हाल्डा के बारे में कोई भी छूटे ना पर इस त्यौहार को अलग अलग हिस्से में अलग तरीके से मनाया जाता है .अगर लाहौल के किसी बंधू के पास ओर जानकारी हैं इस बारे में तो शेयर कर सकते हैं .
हाल्डा के बाद के पहले अमावस्या को सबसे बड़ा त्यौहार *कुंह * यानि *फागली * मनाया जाता है . उसके बारे में फिर कभी
Wednesday, December 22, 2010
तुम कब आओगे मैत्रीये
तुम कब आओगे मैत्रिये
अब हिमालये भी टूट कर दरक रहा है
ज़मीन सागर में डूब रही है
जंगल में लोगों का बसेरा हो गया है
अब गाँव भी गाँव ना रहे
किसान फसलों कि जगह सोना उगा रहे हैं
चारों तरफ फ़ैली
अराजकता ,भ्रष्टाचार और व्यभिचार है
इंसान इंसान बनने को तैयार नहीं
दूसरे कि जान पर जता रहा अपना अधिकार है
रिश्ते बाजार में बिक रहे हैं
अपने झूटे दंभ में हर कोई मजबूर दिख रहा है
चाँद और सूरज भी रौशनी फ़ैलाने से कतरा रहे हैं
तुम कब आओगे मैत्रीय
शायद तुम्हे उस वक़्त का इंतज़ार है
जब करुणा ,शब्द और भाव
दोनों से गायब हो जाएगी
तब दोगे तुम नई परिभाषा
करुणा की .............
अब हिमालये भी टूट कर दरक रहा है
ज़मीन सागर में डूब रही है
जंगल में लोगों का बसेरा हो गया है
अब गाँव भी गाँव ना रहे
किसान फसलों कि जगह सोना उगा रहे हैं
चारों तरफ फ़ैली
अराजकता ,भ्रष्टाचार और व्यभिचार है
इंसान इंसान बनने को तैयार नहीं
दूसरे कि जान पर जता रहा अपना अधिकार है
रिश्ते बाजार में बिक रहे हैं
अपने झूटे दंभ में हर कोई मजबूर दिख रहा है
चाँद और सूरज भी रौशनी फ़ैलाने से कतरा रहे हैं
तुम कब आओगे मैत्रीय
शायद तुम्हे उस वक़्त का इंतज़ार है
जब करुणा ,शब्द और भाव
दोनों से गायब हो जाएगी
तब दोगे तुम नई परिभाषा
करुणा की .............
Tuesday, December 7, 2010
जीवन
पहला कदम ब्लॉग जगत में ,,,
मैं
जितनी बढती जा रही हूँ ,
उतनी ही छोटी होती जा रही हूँ
उलझ गयी हूँ
धागे के उस गोले जैसे
जिसे सुलझाते सुलझाते
ना जाने कितनी गांठें पड़ जाती हैं
मेरा गाँव
पहाड़ों के आँचल में बसा
सुंदर गाँव
पास बहती नदी /बहता नाला
उपजाऊ भूमि
आधुनिक किसान
आधुनिक खेती
बूढ़े विचार
बूढा गाँव
हर पल बदलते लोगों कि भीड़ में
अकेला बूढा होता मेरा गाँव
पहाड़
सुबह से शाम तक
मेरे साथ रहता है
एक पहाड़
पत्थर का बना कहते हैं लोग
साक्षी है मेरे हर सुख का दुख का
मैने इसे देखा है हँसते गाते हुए
मैने इसे देखा है उदास और रोते हुए कभी
शायद जीवन उस पत्थर में भी था
मैं
जितनी बढती जा रही हूँ ,
उतनी ही छोटी होती जा रही हूँ
उलझ गयी हूँ
धागे के उस गोले जैसे
जिसे सुलझाते सुलझाते
ना जाने कितनी गांठें पड़ जाती हैं
मेरा गाँव
पहाड़ों के आँचल में बसा
सुंदर गाँव
पास बहती नदी /बहता नाला
उपजाऊ भूमि
आधुनिक किसान
आधुनिक खेती
बूढ़े विचार
बूढा गाँव
हर पल बदलते लोगों कि भीड़ में
अकेला बूढा होता मेरा गाँव
पहाड़
सुबह से शाम तक
मेरे साथ रहता है
एक पहाड़
पत्थर का बना कहते हैं लोग
साक्षी है मेरे हर सुख का दुख का
मैने इसे देखा है हँसते गाते हुए
मैने इसे देखा है उदास और रोते हुए कभी
शायद जीवन उस पत्थर में भी था
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