Sunday, April 30, 2017

ग़ज़ल

 इश्क –ए –हकीकी की और क्या मिसाल दूँ ,
 मैंने अपनी रूह में एक गाँव बसा रखा है |

 हर बार  बदला सा होता है चेहरा हमारा  ,
 पर चेहरे पर हमारी नज़र कब होती है  |

 पी लेते हैं थोडा -थोडा एक दूसरे को हम ,
 जी लेते हैं यूँ ही कभी एक दूसरे में हम |
 
 हम दुनिया को रूहानी बातें सिखाते रहे ,
 दुनिया हमारे रूह को बेचकर हंसती रही |
 
 अजब बेवकूफ निकले तुम भी हम भी दोस्त ,
 मुर्दों के शहर में जिंदगी की बात करते रहे |

 गम- ए –दौर हमें सिखा गया जिंदगी जीना
 वरना हम तो ख़ुशी को जिंदगी मान बैठे थे |



Tuesday, March 7, 2017

बारूद के शहर में उगा एक पेड़



एक शहर

जिसके हृदय में उगा है

बारूद से भरा एक पेड़

जिसके पत्ते फिर भी हरे हैं 


इस शाकाहारी पेड़ को सींचता  है

शहर का तमाम रक्त

इसकी शाखाओं पर बैठे पक्षी

गाते हैं गीत

हवाओं में तैरते बारूद के गंध की

इसकी  टहनियों में झूलते बच्चे

खामोश  दिनों की तलाश में हैं

इस शहर का हर शक्स

इस पेड़ पर बांधता है

मन्नतों को धागा

जबकि पेड़ तरस रहा है

एक बूंद पानी के लिए